— झाड़ोल–कोटड़ा की महिलाएं बना रहीं गो-काष्ठ, गोबर की मालाएं व अन्य गोबर निर्मित उत्पाद
— रहाड़ा फाउंडेशन से जुड़कर 5 से 6 हजार महिलाएं बनीं बदलाव की भागीदार
— हो सकेगा वन—पर्यावरण, गौ और वैदिक संस्कृति संरक्षण
उदयपुर। आदिवासी अंचल झाड़ोल और कोटड़ा में इस बार होली की तैयारी कुछ अलग अंदाज़ में हो रही है। न जंगलों से ढेरों लकड़ियां काटी जा रही हैं और न ही धुएं से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। यहां की आदिवासी महिलाएं अपने आंगन में बैठकर गोबर से छोटी-छोटी लकड़ियां, मालाएं और अन्य उत्पाद तैयार कर रही हैं, जिन्हें होलिका दहन में उपयोग किया जाएगा। उनके गोबर से सने हाथ और आंखों में आत्मविश्वास की चमक ये संदेश दे रही है कि ऐसी होली मनाएं जो प्रकृति को जलाए नहीं, बल्कि बचाए। इस बदलाव के पीछे प्रेरक भूमिका निभा रहा है रहाड़ा फाउंडेशन। फाउंडेशन ने इन महिलाओं को गो-काष्ठ निर्माण का प्रशिक्षण दिया, उन्हें बाजार से जोड़ा और आत्मनिर्भरता की राह दिखाई। वर्तमान में करीब 5 से 6 हजार आदिवासी महिलाएं इस मिशन से जुड़ चुकी हैं।
महिलाओं को मिला रोजगार, हुई वैदिक परंपरा की वापसी
रहाड़ा फाउंडेशन की अर्चनासिंह चारण ने बताया कि पहले जहां ये महिलाएं होली से पहले जंगल से लकड़ी काटने जाती थीं, अब वे घर बैठे गोबर से पर्यावरण मित्र ईंधन बना रही हैं। इससे एक ओर जंगलों की रक्षा हो रही है, वहीं दूसरी ओर महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका भी मिल रही है। यह बदलाव केवल ईंधन का नहीं, बल्कि सोच का भी है—शोषण से संरक्षण की ओर। रहाड़ा फाउंडेशन की अर्चना सिंह चारण बताती हैं कि पहले के समय में लोग घर-आंगन को गोबर से लीपते थे, कंडे बनाते थे और गोबर का हर तरह से उपयोग करते थे, क्योंकि वे जानते थे कि गोबर प्राकृतिक रूप से एंटी-बैक्टीरियल और रोगाणुरोधी होता है। आधुनिक जीवनशैली में यह ज्ञान धीरे-धीरे पीछे छूट गया, जबकि आज यही परंपरा पर्यावरण संरक्षण का सबसे मजबूत उपाय बन सकती है।
होलिका दहन, यज्ञ—हवन, दाह संस्कार में भी कारगर गो-काष्ठ
चारण ने बताया कि एक दाह संस्कार में औसतन 6 से 7 क्विंटल लकड़ी लगती है, जबकि केवल 3 से 4 क्विंटल गो-काष्ठ में ही वही कार्य हो जाता है, वह भी कम धुएं और कम प्रदूषण के साथ। यही कारण है कि अब गोबर की लकड़ियों को सिर्फ होलिका दहन ही नहीं, बल्कि यज्ञ-हवन और दाह संस्कार जैसे धार्मिक कार्यों में भी बढ़ावा दिया जा रहा है। चारण ने बताया कि इस बार होली को लेकर विशेष अभियान चलाया जा रहा है ताकि अधिक से अधिक लोग गोबर की लकड़ियों और मालाओं का उपयोग करें। साथ ही सिटी पैलेस में होने वाले होलिका दहन में भी इनके उपयोग के लिए निवेदन किया गया है, जिससे समाज को एक बड़ा संदेश दिया जा सके।
गोबर से विभिन्न उपयोगी उत्पाद तैयार कर रही हैं महिलाएं
आदिवासी महिलाएं गाय के गोबर से लकड़ियां, ईंटें, अगरबत्तियां, दीये, मालाएं और गो-काष्ठ जैसे कई उत्पाद बना रही हैं। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण और वन संरक्षण हो रहा है, बल्कि गौ-संरक्षण और वैदिक संस्कृति को भी नया जीवन मिल रहा है। फाउंडेशन के माध्यम से महिलाएं राजीविका, आजीविका मिशन, वन विभाग, महिला अधिकारिता विभाग और विभिन्न हाट-बाजारों व मेलों में स्टॉल लगाकर अपने उत्पाद बेचती हैं। उदयपुर के अमृता हाट में भी इनके स्टॉल लगाए जाएंगे। इनसे होने वाली आमदनी सीधे आदिवासी महिलाओं को दी जाती है।