2 मार्च को होगा होलिका दहन, 3 मार्च को रंगों के साथ रहेगा सूतक का प्रभाव
जीवीआई नेटवर्क। इस वर्ष होली का पर्व सामान्य नहीं, बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से एक दुर्लभ संयोग के साथ मनाया जाएगा। भद्रा काल और खग्रास चंद्र ग्रहण के एक साथ पड़ने से लोगों में पूजा, दहन और रंग खेलने को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। पंचांग के अनुसार, 2 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा, जबकि 3 मार्च को धुलंडी के दिन खग्रास चंद्र ग्रहण रहेगा। ग्रहण से करीब 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाएगा, जिसमें शुभ कार्य, पूजा-पाठ और मंदिर दर्शन को वर्जित माना गया है। ऐसे में इस बार होली सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि समय-सारिणी का भी पर्व बन गई है।
सीमित समय में होगा होलिका दहन
पं. जितेंद्र त्रिवेदी के अनुसार, इस बार होलिका दहन के लिए समय बेहद सीमित है। 2 मार्च की शाम को सिर्फ 12 मिनट का मुहूर्त उपलब्ध रहेगा, जबकि अर्द्ध रात्रि में लगभग 1 घंटे 10 मिनट तक दहन किया जा सकेगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार प्रदोषकाल में दहन करना शास्त्रसम्मत और श्रेष्ठ माना गया है।
भद्रा काल का प्रभाव
2 मार्च को शाम 5:55 बजे से भद्रा काल शुरू होकर 3 मार्च सुबह 4:28 बजे तक रहेगा। इस दौरान भद्रा भूलोक में और सिंह राशि में मानी जा रही है। ऐसे में प्रदोष काल में होलिका पूजन और दहन को सुरक्षित और मान्य बताया गया है। भद्रा काल में दान-पुण्य किया जा सकता है, लेकिन मांगलिक कार्यों से बचने की सलाह दी गई है।
चंद्र ग्रहण का ये रहेगा समय
3 मार्च को दोपहर 3:20 बजे खग्रास चंद्र ग्रहण शुरू होगा और शाम 6:48 बजे समाप्त होगा। जयपुर में चंद्र उदय 6:29 बजे होगा, जिससे ग्रहण दृश्य अवधि मात्र 18 मिनट की रहेगी। ग्रहण का सूतक मंगलवार सुबह 6:20 बजे से लागू होगा। ग्रहण पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र और सिंह राशि में बनेगा और भारत में दिखाई देगा। इसी कारण होलिका दहन को 2 मार्च को ही करना शास्त्रसम्मत बताया गया है।