कुछ कहानियाँ सिर्फ सफलता की नहीं होतीं—वे समय, संघर्ष और संकल्प के उस गठजोड़ की गवाही होती हैं, जो इंसान को साधारण से असाधारण बना देता है।
RAS 2024 का परिणाम भी ऐसी ही तीन कहानियों को सामने लाया—अर्चित कंठालिया, पवन मेघवाल और जितेंद्र डांगी। तीन रास्ते, तीन संघर्ष—लेकिन मंज़िल एक: प्रशासनिक सेवा।
अर्चित कंठालिया: पटवारी से आरएएस तक—एक सधे कदमों की कहानी

उदयपुर के अर्चित ने 145वीं रैंक हासिल कर यह साबित किया कि सफर सीधा नहीं होना चाहिए—स्पष्ट होना चाहिए।
पटवारी की ट्रेनिंग के साथ RAS की तैयारी… यह कोई आसान समीकरण नहीं था।
दिन के 8 घंटे पढ़ाई, सोशल मीडिया से दूरी, और एक अनुशासित जीवन—यही उनका ब्लूप्रिंट था।
उनका सफर बताता है—
“कामयाबी एक दिन में नहीं मिलती, पर हर दिन की मेहनत उसमें जुड़ती रहती है।”
परिवार का साथ, सीमित संसाधन और आत्मनियंत्रण—इन तीन स्तंभों पर अर्चित ने अपना भविष्य खड़ा किया।
पवन मेघवाल: 7 साल का तप… और आखिरकार सफलता

वल्लभनगर के रूंडेड़ा गांव से निकलकर पवन ने SC वर्ग में 34वीं रैंक हासिल की।
लेकिन इस रैंक के पीछे 7 साल का लंबा इंतजार, असफलताओं की चोट और धैर्य की परीक्षा छिपी है।
IIT से B.Tech करने के बाद भी उन्होंने कोई “प्लान B” नहीं चुना।
IAS और RAS—बस यही लक्ष्य था।
दो बार असफलता मिली… रास्ता बदलने का विचार आया…
लेकिन परिवार ने कहा—“ठहरो, अभी सफर बाकी है।”
और वही ठहराव उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।
“हर असफलता, अगर सही नजर से देखो, तो अगली सफलता की तैयारी होती है।”
जितेंद्र डांगी: बिना कोचिंग, सिर्फ आत्मविश्वास से हासिल किया मुकाम

राजसमंद के थूर गांव से निकलकर जितेंद्र ने वह कर दिखाया, जिसे लोग अक्सर “संभव नहीं” कह देते हैं।
सब्जी बेचने वाले पिता का बेटा…
सरकारी स्कूल से पढ़ाई…
कोई कोचिंग नहीं…
और 5 असफल प्रयास…
लेकिन छठे प्रयास में उन्होंने RAS में चयन पाकर यह साबित किया—
प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती।
एक DSP से हुई बातचीत ने उनके भीतर अधिकारी बनने का सपना जगाया… और उन्होंने उस एक चिंगारी को बुझने नहीं दिया।
“जब हालात कमजोर हों, तब इरादे मजबूत होने चाहिए।”
Credits – Dainik Bhaskar