राजस्थान के उदयपुर में सरकारी शिक्षक दुर्गाराम मुवाल ने 9 दिनों में 20 ड्रॉपआउट बेटियों को फिर से स्कूल से जोड़ा। जानिए कैसे अपनी सैलरी खर्च कर बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं।
जीवीआई नेटवर्क। 1 अप्रैल से राजस्थान के सरकारी स्कूलों में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही प्रवेशोत्सव और घर-घर सर्वे अभियान ने रफ्तार पकड़ ली है। इसका उद्देश्य ड्रॉपआउट बच्चों को फिर से शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना है। लेकिन इसी व्यवस्था के बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इस जिम्मेदारी को सिर्फ कर्तव्य नहीं, बल्कि संकल्प मानते हैं। ऐसी ही सोच रखते हैं,राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय रेल्वे ट्रेनिंग उदयपुर में पदस्थापित दुर्गाराम मुवाल। उन्होंने इस अभियान को एक नई दिशा दी है। जहां कई जगह यह प्रक्रिया महज औपचारिकता बनकर रह जाती है, वहीं दुर्गाराम इसे बच्चों के भविष्य की नींव मानकर पूरे समर्पण से निभा रहे हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2022 में दुर्गाराम मुवाल राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं।
खुद की तनख्वाह लगा रहे बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए
दुर्गाराम मुवाल खुद की स्कूल में तो नामांकन बढ़ाते ही हैं, उसके साथ ही खुद की तनख्वाह से उदयपुर संभाग के अनाथ, निराश्रित, लावारिस, बेघर, बेसहारा, एकल अभिभावक, बालश्रम, बाल तस्करी से मुक्त, बाल विवाह से मुक्त, विद्यालय विहीन क्षेत्र, दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र एवं दिव्यांग लड़के-लड़कियों को गांव-गांव जाकर पहाड़ों में हजारों किलोमीटर का सफर तय कर ढूंढ कर उनको सामान्य स्कूल, आवासीय स्कूल एवं विशेष स्कूलों में जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। प्रतिवर्ष 100 से ज्यादा लड़के-लड़कियों को शिक्षा से जोड़ते हैं, जिन लड़के-लड़कियों के कागजात बने हुए नहीं होते हैं, उनके कागजात बनवाने से लेकर इनकी फीस, कपड़े, स्टेशनरी आदि की व्यवस्था अपने स्तर पर करते हैं।
20 बेटियों को दिखाई स्कूल की राह, अन्य 25 बच्चों को भी जोड़ा स्कूलों व छात्रावासों से
नए सत्र की शुरुआत के महज 9 दिनों के भीतर ही उन्होंने 20 ड्रॉपआउट बालिकाओं को दोबारा शिक्षा से जोड़कर एक असाधारण उदाहरण पेश किया है। हाल ही में कोटड़ा क्षेत्र की अलग—अलग परिस्थितियों की जरूरतमंद 20 बालिकाओं का कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय ओड़ा में प्रवेश करवाया। ये वो बालिकाएं हैं जो कभी भी शिक्षा से नहीं जुड़ पाती या प्राथमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देती क्योंकि अधिकांश बालिकाओं को प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद 15 किलोमीटर से ज्यादा दूर स्कूल में प्रवेश लेना पड़ता है जो लडकियों के लिए आसान नहीं है, इस कारण सैकड़ों बालिकाएं पढ़ाई से वंचित हो जाती है। वहीं, इनके अलावा लगभग 25 से अधिक बच्चों का अन्य स्कूलों व छात्रावासों में प्रवेश करवाया है।
बच्चों के भविष्य के लिए जमीनी संघर्ष, इनका मोबाइल नंबर ही हेल्पलाइन नंबर
दुर्गाराम मुवाल घर-घर जाकर अभिभावकों से संवाद करते हैं, सामाजिक बाधाओं को समझते हैं और बेटियों की पढ़ाई के लिए रास्ते तैयार करते हैं। उनके प्रयास केवल नामांकन तक सीमित नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने तक हैं कि बच्चियां निरंतर शिक्षा से जुड़ी रहें। वहीं, दुर्गाराम मुवाल के मोबाइल नंबर जरूरतमंद एवं मुसीबत में फंसे बच्चों के लिए हेल्पलाइन नंबर हैं, ऐसे बच्चों से संबंधित फोन आते ही दुर्गाराम बिना समय, मौसम की परवाह किये तुरन्त बच्चों की सहायता करने पहुंच जाते हैं, दुर्गाराम मुवाल को आदिवासी समुदाय का मसीहा माना जाता है, अपनी कार्यशैली के कारण युवाओं में वे “जेम्स बॉन्ड” के नाम से जाने जाते हैं।