FIFA 2026 : Udaipur का ऐसा गांव, जहां फुटबॉल ने बदल दी आदिवासी युवाओं की तकदीर

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FIFA World Cup 2026 के बीच जानिए उदयपुर के जावर माइंस फुटबॉल विलेज की प्रेरक कहानी, जहां फुटबॉल ने आदिवासी युवाओं की पहचान, रोजगार और भविष्य बदल दिया है।

जीवीआई नेटवर्क। दुनिया फुटबॉल वर्ल्ड कप 2026 के रोमांच में डूबी हुई है। करोड़ों लोग दुनिया के बड़े खिलाड़ियों और अंतरराष्ट्रीय स्टेडियमों पर नजरें टिकाए हुए हैं, लेकिन राजस्थान के उदयपुर जिले से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित जावर माइंस (Zawar Mines) एक ऐसी मिसाल बनकर उभरा है, जिसने फुटबॉल के जरिए पूरे आदिवासी क्षेत्र की पहचान बदल दी है।अरावली की पहाड़ियों के बीच बसा यह गांव आज उदयपुर का फुटबॉल विलेज कहलाता है। यहां फुटबॉल केवल एक खेल नहीं, बल्कि युवाओं के सपनों, रोजगार और पहचान का आधार बन चुका है।

हर घर में एक फुटबॉलर, लड़कियां भी नहीं पीछे

आमतौर पर आदिवासी क्षेत्रों की पहचान खेती, पशुपालन और रोजमर्रा के संघर्षों से होती है, लेकिन जावर माइंस ने अपनी अलग पहचान बनाई है। यहां लगभग हर घर से एक फुटबॉलर निकलता है। गांव के बच्चे छोटी उम्र से ही मैदान में उतर जाते हैं और युवाओं के लिए फुटबॉल जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है। करीब 44 वर्ष पहले हिंदुस्तान जिंक ने अपने कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (CSR) कार्यक्रम के तहत यहां फुटबॉल मैदान विकसित किया था। समय के साथ यह मैदान राष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से लैस हो गया और आज यहां बड़े टूर्नामेंट आयोजित किए जाते हैं।

मोहन कुमार मंगलम फुटबॉल टूर्नामेंट ने दिलाई राष्ट्रीय पहचान

ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1973 में तत्कालीन केंद्रीय खनन एवं इस्पात मंत्री मोहन कुमार मंगलम जावर माइंस आए थे। उनके निधन के बाद वर्ष 1976 में उनकी स्मृति में मोहन कुमार मंगलम फुटबॉल टूर्नामेंट की शुरुआत की गई।हिंदुस्तान जिंक और जावर माइंस मजदूर संघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह प्रतियोगिता आज राजस्थान की प्रतिष्ठित फुटबॉल प्रतियोगिताओं में शामिल है। आदिवासी क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली यह अनूठी प्रतियोगिता दशकों से खिलाड़ियों को मंच प्रदान कर रही है।

जब पहाड़ियों पर बैठकर देखते हैं हजारों दर्शक

करीब 200 मकानों और लगभग 1200 की आबादी वाले इस गांव में टूर्नामेंट के दौरान खेल का उत्साह चरम पर पहुंच जाता है। आसपास के 30 से अधिक गांवों से हजारों लोग मैच देखने आते हैं। मैदान में जगह कम पड़ने पर लोग अरावली की पहाड़ियों पर बैठकर मुकाबलों का आनंद लेते हैं।
पूरे इलाके में मेले जैसा माहौल बन जाता है और गांव किसी छोटे स्टेडियम शहर की तरह नजर आता है।

फुटबॉल ने बदली सैकड़ों युवाओं की जिंदगी

जावर माइंस में फुटबॉल ने केवल पहचान ही नहीं दी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। यहां से खेल चुके कई खिलाड़ी आज सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं। कोई शारीरिक शिक्षक (PTI) है, कोई पुलिस विभाग में सब-इंस्पेक्टर है तो कई अन्य सरकारी पदों पर सेवाएं दे रहे हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि गांव में फुटबॉल केवल खेल नहीं बल्कि सम्मान और गर्व का प्रतीक है।

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