उदयपुर के आजाद ने शुरू किया ‘आजाद-वादी—द वैली ऑफ फ्रीडम’ फॉरेस्ट स्कूल, प्रकृति के बीच बच्चों को सीखने की आजादी देने की पहल
जीवीआई नेटवर्क। क्या हर बच्चे के सीखने का तरीका एक जैसा हो सकता है? क्या शिक्षा का मतलब केवल किताबें, परीक्षाएं और अंक हैं? उदयपुर के एजुकेटर और नेचुरल लाइफस्टाइल प्रैक्टिशनर आजाद की कहानी इन सवालों के जवाब तलाशती है। जिस पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में उन्हें कभी ‘असफल’ माना गया, उसी अनुभव ने उन्हें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की कल्पना करने के लिए प्रेरित किया, जहां बच्चे डर के बजाय जिज्ञासा के साथ सीखें।आजाद ने अपने जीवन में करीब सात स्कूल बदले और दो कॉलेज छोड़े। लेकिन पढ़ाई का सफर यहीं खत्म नहीं हुआ। इसके उलट उन्होंने सीखने के नए रास्ते तलाशे और बाद में गुरुग्राम में ‘आजाद-वादी—द वैली ऑफ फ्रीडम’ नाम से फॉरेस्ट स्कूल की शुरुआत की। यहां प्रकृति कक्षा बनी और अनुभव पाठ्यपुस्तक।
सात स्कूल बदले, दो कॉलेज छोड़े लेकिन सीखना नहीं छोड़ा

आजाद बताते हैं कि पारंपरिक स्कूल व्यवस्था उनके लिए सहज नहीं थी। उदयपुर में उन्होंने करीब सात स्कूल बदले। इसके बाद दो कॉलेज भी छोड़ दिए। उस समय यह फैसला शायद असफलता जैसा दिखाई देता था, लेकिन आजाद के मन में एक सवाल लगातार बना रहा—क्या समस्या बच्चे में है या उस व्यवस्था में, जो हर बच्चे को सीखने का एक ही तरीका देती है?
बॉक्सिंग में उनकी रुचि ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया, लेकिन यह सफर भी आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद उन्होंने करीब दो वर्ष उदयपुर के झाड़ोल क्षेत्र के आदिवासी समुदायों के बीच बिताए। यही अनुभव उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बना।
उन्होंने महसूस किया कि सीखने के लिए हमेशा चार दीवारों और ब्लैकबोर्ड की जरूरत नहीं होती। जंगल, खेत, मिट्टी, पशु, भोजन, लोककथाएं और समुदाय भी बच्चों के लिए ज्ञान के स्रोत बन सकते हैं।
प्रकृति बनी शिक्षक, अनुभव बनी पाठ्यपुस्तक
यहीं से आजाद के मन में प्रकृति आधारित शिक्षा और फॉरेस्ट स्कूल की अवधारणा मजबूत हुई। उनका मानना है कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो इंसान को स्वतंत्र बनाए, न कि उसे केवल अंकों और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में बांध दे।
गुरुग्राम में होम-स्कूलिंग से जुड़े अभिभावकों के साथ मिलकर उन्होंने शहर से दूर आजाद-वादी—द वैली ऑफ फ्रीडम की नींव रखी। इस पहल में एमिली ने भी उनका साथ दिया, जो होलिस्टिक हीलिंग गाइड और योगी हैं। इस कारण यहां शिक्षा के साथ स्वास्थ्य और समग्र जीवनशैली पर भी ध्यान दिया गया।

फॉरेस्ट स्कूल में बच्चों के लिए सीखना केवल किताबों तक सीमित नहीं था। बच्चे मिट्टी से घर बनाते, चित्रकारी और कला सीखते, खेती और भोजन की प्रक्रिया समझते और पशुओं तथा प्रकृति के बीच समय बिताते थे।
‘डर से नहीं, आजादी से सीखें बच्चे’
आजाद के अनुसार बच्चों को शिक्षा से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उसे अनुभव करना चाहिए। उनका सवाल है कि अगर बच्चे सवाल नहीं पूछ सकते, प्रयोग नहीं कर सकते और अपनी जिज्ञासा के आधार पर आगे नहीं बढ़ सकते तो शिक्षा उन्हें कितना स्वतंत्र बना पाएगी?
आज की प्रतिस्पर्धी व्यवस्था में अभिभावक भी लगातार आगे निकलने की दौड़ में हैं और बच्चों को भी उसी दौड़ में शामिल कर देते हैं। आजाद इसे ऐसी व्यवस्था मानते हैं, जिससे बच्चों को बाहर निकलने की जरूरत है।
आजाद-वादी में परिवार और समुदाय को भी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया। बच्चे ग्रामीण जीवन को करीब से समझते, लोगों के साथ खाना बनाते, खेती से जुड़ते और प्रकृति के साथ समय बिताते थे।
शिक्षा के साथ स्वास्थ्य और जीवनशैली पर भी जोर
आजाद की पहल केवल वैकल्पिक शिक्षा तक सीमित नहीं रही। यहां बच्चों के सीखने के साथ स्वास्थ्य, प्रकृति और जीवनशैली को भी महत्वपूर्ण माना गया। उनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार हासिल करना नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर ढंग से समझने और जीने की क्षमता विकसित करना भी होना चाहिए।
अब उदयपुर और केरल तक पहुंचने की तैयारी
‘आजाद-वादी’ की अवधारणा अब गुरुग्राम से आगे ले जाने की संभावनाएं तलाश रही है। उदयपुर और केरल में भी इस तरह की पहल की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है।