एक अंक से टूटा ओलंपिक पदक का सपना, फिर कांस्य जीतकर रचा इतिहास; माहेश्वरी चौहान की कहानी हर लड़की को देगी हौसला
कभी हार के करीब पहुंचकर भी हिम्मत नहीं हारी, आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमक रहा है उदयपुर का नाम; माहेश्वरी चौहान को मिलेगा मेयो कॉलेज गर्ल्स स्कूल का ‘उत्कृष्टता के लिए पूर्व छात्र पुरस्कार 2026’
Gvii नेटवर्क l जिंदगी में कुछ सपने ऐसे होते हैं, जिनके लिए इंसान सालों तक मेहनत करता है। मंजिल सामने दिखाई
देने लगे और सफलता महज एक कदम दूर रह जाए, तो उस अधूरे सपने का दर्द भी उतना ही गहरा होता है। लेकिन कुछ लोग इस दर्द को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बना लेते हैं। उदयपुर की निशानेबाज माहेश्वरी चौहान ऐसी ही खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने मुश्किल पलों से सीख लेकर आगे बढ़ने का हौसला दिखाया।
पेरिस ओलंपिक 2024 में पदक से महज एक अंक दूर रह जाने वाली माहेश्वरी ने अपने खेल सफर को रुकने नहीं दिया। एशियाई खेल 2026 में भारतीय महिला स्कीट टीम के साथ कांस्य पदक जीतकर उन्होंने देश का गौरव बढ़ाया। उनकी उपलब्धि सिर्फ एक पदक की कहानी नहीं है, बल्कि उस जज्बे की मिसाल है, जो असफलता के बाद भी सपनों का पीछा करना नहीं छोड़ता।
अब उनकी इसी उपलब्धि और खेल जगत में योगदान को सम्मान देते हुए मेयो कॉलेज गर्ल्स स्कूल, अजमेर ने उन्हें ‘उत्कृष्टता के लिए पूर्व छात्र पुरस्कार 2026’ के लिए चुना है। पुरस्कार समारोह 29 से 31 अक्टूबर तक आयोजित होगा।

दादा के शूटिंग रेंज से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर
माहेश्वरी चौहान का जन्म 4 जुलाई 1996 को राजस्थान के जालोर जिले के सियाना गांव में हुआ। उनका परिवार निशानेबाजी के प्रति रुचि रखता था। उनके दादा गणपत सिंह चौहान को बंदूकों का शौक था और परिवार के पास निजी शूटिंग रेंज भी था।
बचपन में गर्मियों की छुट्टियों के दौरान शूटिंग रेंज में बिताया गया समय माहेश्वरी के लिए एक खास अनुभव बन गया। करीब 12 साल की उम्र में उन्होंने शॉटगन से निशानेबाजी का अनुभव लेना शुरू किया। धीरे-धीरे यह शौक जुनून में बदलने लगा।
वर्ष 2012 में उन्होंने नियमित अभ्यास शुरू किया और 2013 से प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगीं। निशानेबाजी में सफलता के लिए केवल सटीक निशाना लगाना ही पर्याप्त नहीं होता। एकाग्रता, धैर्य, मानसिक संतुलन और दबाव में सही निर्णय लेने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी होती है।
माहेश्वरी ने लगातार अभ्यास और प्रतियोगिताओं के अनुभव से अपने खेल को निखारा। वर्ष 2017 में कजाखस्तान के अस्ताना में आयोजित एशियाई शॉटगन चैंपियनशिप में महिला स्कीट स्पर्धा का कांस्य पदक जीतकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
यह उपलब्धि उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव बनी। एक छोटे से गांव से शुरू हुआ उनका सफर अब भारतीय निशानेबाजी के बड़े मंच तक पहुंच चुका था।
पेरिस ओलंपिक में एक अंक से दूर रह गया सपना
हर खिलाड़ी का सपना होता है कि वह ओलंपिक में अपने देश का प्रतिनिधित्व करे और पदक जीतकर तिरंगे का मान बढ़ाए। माहेश्वरी चौहान ने भी इस सपने को पूरा करने के लिए वर्षों तक मेहनत की।
2024 में दोहा में आयोजित ओलंपिक क्वालिफिकेशन प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन के बाद उन्होंने पेरिस ओलंपिक के लिए भारत का कोटा हासिल किया।
पेरिस ओलंपिक में माहेश्वरी ने महिला व्यक्तिगत स्कीट स्पर्धा के साथ मिश्रित टीम स्कीट में भी हिस्सा लिया। अनंतजीत सिंह नरुका के साथ भारतीय जोड़ी कांस्य पदक के मुकाबले तक पहुंची।
लेकिन पदक के लिए हुए मुकाबले में भारतीय जोड़ी चीन से केवल एक अंक पीछे रह गई। भारत ने 43 अंक हासिल किए, जबकि चीन के खाते में 44 अंक आए।
सालों की मेहनत के बाद ओलंपिक पदक से महज एक अंक दूर रह जाना किसी भी खिलाड़ी के लिए बेहद निराशाजनक अनुभव हो सकता है। वह एक अंक उनके ओलंपिक सफर और पदक के बीच खड़ा था।
लेकिन माहेश्वरी की कहानी उस अधूरे सपने पर खत्म नहीं हुई।
क्योंकि असली खिलाड़ी वह नहीं, जो कभी हार का सामना न करे। असली खिलाड़ी वह है, जो हार के बाद भी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना जारी रखे।
एशियाई खेलों में कांस्य पदक से दिया जवाब

पेरिस ओलंपिक के अनुभव के बाद भी माहेश्वरी ने निशानेबाजी के प्रति अपना समर्पण बनाए रखा। एशियाई खेल 2026 में उन्होंने भारतीय महिला स्कीट टीम के साथ कांस्य पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया।
माहेश्वरी चौहान, परिनाज धालीवाल और राइजा ढिल्लों की भारतीय टीम ने महिला स्कीट स्पर्धा में कुल 331 अंक हासिल कर तीसरा स्थान प्राप्त किया।
यह जीत बताती है कि किसी एक प्रतियोगिता का परिणाम खिलाड़ी की क्षमता का अंतिम फैसला नहीं होता। खेल में हर नया मुकाबला एक नया अवसर लेकर आता है। पिछली हार से मिली सीख और अभ्यास के प्रति प्रतिबद्धता ही खिलाड़ी को आगे बढ़ने की ताकत देती है।
माहेश्वरी की उपलब्धि उन युवाओं के लिए खास संदेश है, जो किसी परीक्षा, प्रतियोगिता या जीवन के किसी मोड़ पर असफलता का सामना कर रहे हैं। एक बार उम्मीद टूटने का मतलब यह नहीं कि आगे के रास्ते बंद हो गए हैं।
कभी-कभी मंजिल तक पहुंचने से पहले जिंदगी हमें ठहरकर अपनी तैयारी को और बेहतर बनाने का अवसर देती है।
उपलब्धियों को मिलेगा सम्मान, दूसरी लड़कियों के लिए बनेंगी प्रेरणा

मेयो कॉलेज गर्ल्स स्कूल, अजमेर ने माहेश्वरी चौहान को ‘उत्कृष्टता के लिए पूर्व छात्र पुरस्कार 2026’ के लिए चुना है। स्कूल समिति ने मेयो गर्ल्स एलुमनी एसोसिएशन के सहयोग से उनका चयन किया।
वर्ष 2023 में शुरू किया गया यह पुरस्कार उन पूर्व छात्राओं को दिया जाता है, जिन्होंने अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल करने के साथ समाज में भी सार्थक योगदान दिया हो। इसमें नेतृत्व, दृढ़ता, समर्पण और संवेदनशीलता जैसे मूल्यों को महत्व दिया जाता है।
माहेश्वरी को यह सम्मान भारतीय खेलों में उनके योगदान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन के लिए दिया जा रहा है। पेरिस ओलंपिक 2024 में उनका प्रदर्शन और एशियाई खेल 2026 में कांस्य पदक जीतना उनकी यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
उनकी उपलब्धियां उन छात्राओं और युवतियों को प्रेरित कर सकती हैं, जो खेल सहित किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं।
माहेश्वरी की यात्रा यह भी बताती है कि सपनों को पूरा करने के लिए प्रतिभा के साथ मेहनत, अनुशासन और परिवार का सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बेटियों के लिए एक बड़ा संदेश
माहेश्वरी चौहान की कहानी को केवल पदक और पुरस्कारों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस सोच को बदलने वाली कहानी है, जिसमें कई बार लड़कियों के सपनों के सामने सीमाएं खड़ी कर दी जाती हैं।
निशानेबाजी जैसे खेल में अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाना आसान नहीं है। इसके लिए लगातार अभ्यास, मानसिक मजबूती और प्रतियोगिताओं के दबाव का सामना करने की क्षमता चाहिए। माहेश्वरी ने अपने प्रदर्शन से दिखाया कि दृढ़ संकल्प हो तो राजस्थान की बेटी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व कर सकती है।
उनकी यात्रा में एक संदेश उन अभिभावकों के लिए भी है, जो अपनी बेटियों को किसी अलग क्षेत्र में आगे बढ़ते देखना चाहते हैं। बच्चों की रुचि को पहचानना, उन्हें अवसर देना और मुश्किल समय में उनका साथ निभाना उनकी सफलता की मजबूत नींव बन सकता है।

मंजिल से ज्यादा जरूरी है आगे बढ़ते रहने का हौसला
ओलंपिक में एक अंक से पदक चूकना और फिर एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतना, माहेश्वरी चौहान के सफर के दो अलग-अलग पड़ाव हैं। एक में अधूरे सपने की कसक है, तो दूसरे में लगातार मेहनत के बाद मिली सफलता की खुशी।
इन दोनों के बीच छिपा है वह संघर्ष, जिसे अक्सर पदक की चमक के पीछे देखना मुश्किल होता है।
उदयपुर की माहेश्वरी चौहान की कहानी हमें याद दिलाती है कि जिंदगी में हर लक्ष्य पहली कोशिश में हासिल नहीं होता। असफलता का सामना करना पड़ सकता है, मेहनत का परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं मिल सकता है, लेकिन इससे हमारी क्षमताएं खत्म नहीं हो जातीं।
कभी-कभी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक यही होता है कि निशाना चूक जाने के बाद भी बंदूक नीचे नहीं रखनी चाहिए। फिर से लक्ष्य साधना चाहिए, क्योंकि अगली कोशिश ही आपकी कहानी का सबसे खूबसूरत अध्याय बन सकती है।