Udaipur Water Crisis: जब सूखी थीं पिछोला-फतहसागर, ऐतिहासिक बावड़ियां बनी थीं संकटमोचक
जब 1987-88 के भीषण सूखे में पिछोला और फतहसागर का जलस्तर बेहद नीचे पहुंच गया था, तब उदयपुर की ऐतिहासिक बावड़ियां संकटमोचक बनीं। जानिए शहर की पारंपरिक water heritage की कहानी।
जीवीआई नेटवर्क। झीलों का शहर उदयपुर केवल पिछोला और फतहसागर जैसी झीलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध water heritage के लिए भी जाना जाता है। शहर की प्राचीन जल व्यवस्था में बावड़ियों, कुओं, कुइयों और तालाबों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सदियों पहले विकसित किया गया यह पारंपरिक जल तंत्र कभी शहर और आसपास के इलाकों की lifeline हुआ करता था। आज इनमें से कई ऐतिहासिक बावड़ियां अतिक्रमण, गंदगी और उपेक्षा के कारण अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। लेकिन उदयपुर के इतिहास में एक ऐसा दौर भी आया, जब आधुनिक जल व्यवस्था पर संकट गहराया तो इन्हीं पुरानी बावड़ियों ने शहर को पानी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
‘दस कूप समा वापी’ में छिपा है जल संरक्षण का संदेश

भारतीय परंपरा में जलस्रोतों के महत्व को इस उक्ति के जरिए बताया गया है—
“दस कूप समा वापी, दस वापी समो ह्रद।
दस ह्रद समो पूत, दस पूत समो द्रुम।।“
अर्थात दस कुओं के निर्माण के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब और दस तालाबों के बराबर एक पुत्र के समान महत्व माना गया है। वहीं दस पुत्रों के बराबर पुण्य एक वृक्ष लगाने को बताया गया है। यह उक्ति उस दौर की water conservation thinking को दर्शाती है, जब पानी को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और भविष्य की सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता था।
उदयपुर में कभी थीं सवा सौ से ज्यादा बावड़ियां
डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार उदयपुर शहर में कभी सवा सौ से अधिक प्राचीन बावड़ियां और कुइयां थीं। त्रिमुखी बावड़ी, बेदवास की बावड़ी, सर्वऋतुविलास की बावड़ी, सुंदर बावड़ी, भुवाणा की बावड़ी और नौलखा बावड़ी प्रमुख जलस्रोतों में शामिल रही हैं। समय के साथ शहर के विस्तार और बदलती जीवनशैली ने इन पारंपरिक water sources को पीछे छोड़ दिया। कई बावड़ियां जमींदोज हो गईं, कुछ अतिक्रमण की चपेट में आ गईं और कई में कचरा डाला जाने लगा। कुछ स्थानों पर इनके ऊपर पार्क और अन्य निर्माण भी हो गए।
1987-88 का सूखा बना Turning Point

उदयपुर के water crisis के इतिहास में 1987-88 का दौर बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। भीषण सूखे के दौरान शहर के कई इलाकों में कई दिनों तक पेयजल नहीं पहुंच पाया। लोगों को पानी खरीदकर अपनी जरूरत पूरी करनी पड़ी। इसी दौरान पिछोला और फतहसागर झीलों का जलस्तर भी बेहद नीचे चला गया और दोनों झीलें लगभग सूखने की स्थिति में पहुंच गई थी।
“मेवाड़ ने पानी को हमेशा कीमती माना”

इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू बताते हैं कि मेवाड़ की पारंपरिक जल व्यवस्था सिर्फ पानी संग्रह करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें पानी को स्वाभाविक रूप से साफ रखने की तकनीक भी शामिल थी। उनके अनुसार, पिछोला झील में ऐसी कुइयां थीं, जो प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करती थीं। बावड़ियां भी एक तरह से फिल्टर प्लांट का काम करती थीं। मेवाड़ में पानी को बेहद कीमती संसाधन मानकर उसका संचयन किया जाता था। तत्कालीन समय में कई रानियों ने बावड़ियों का निर्माण करवाया। डॉ. जुगनू के अनुसार मेवाड़ की बावड़ियां केवल कलात्मकता के लिए नहीं, बल्कि जल संरक्षण और उपयोगिता को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं।
29 बावड़ियां अब भी बचीं, कई में पानी उपयोग योग्य
डॉ. जुगनू के अनुसार वर्तमान में उदयपुर में करीब 29 बावड़ियां ऐसी हैं, जिन्हें फिर से उपयोग में लिया जा सकता है। इनमें से करीब दो दर्जन बावड़ियों के पानी को आवश्यक सावधानी और उचित जांच के बाद उपयोग में लिया जा सकता है। वे बताते हैं कि समय के साथ कई महत्वपूर्ण बावड़ियां पूरी तरह खत्म हो गईं। धाउजी की बावड़ी, काली बावड़ी और धोली बावड़ी इसका उदाहरण हैं। यह सिर्फ पुरानी इमारतों का खत्म होना नहीं है, बल्कि शहर की पारंपरिक जल प्रणाली के एक हिस्से का समाप्त होना भी है।
झीलें ही नहीं, बावड़ियां भी बचानी होंगी

उदयपुर की जल विरासत का संरक्षण केवल झीलों की सफाई और सौंदर्यीकरण तक सीमित नहीं रह सकता। झीलों तक पानी पहुंचाने वाले पारंपरिक जलस्रोत, जलागम क्षेत्र, कुएं, कुइयां और बावड़ियां भी इसी व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ियां रहे हैं। आज जब शहर लगातार बढ़ रहा है और भविष्य में जल संकट की आशंका बनी रहती है, ऐसे में पुराने जलस्रोतों को अतीत की निशानी मानकर छोड़ने के बजाय भविष्य की जल सुरक्षा के हिस्से के रूप में देखना जरूरी है। बावड़ियों की सफाई, जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण, अतिक्रमण हटाना और पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच जैसे कदम इस विरासत को फिर उपयोगी बना सकते हैं।